अपना दृष्टिकोण बदलें
— श्रीराम शर्मा आचार्य
— श्रीराम शर्मा आचार्य
हमारा दृष्टिकोण भी सुधरे
संसार की प्रत्येक वस्तु में भले-बुरे दोनों प्रकार के तत्त्व विद्यमान हैं; ठीक उसी तरह जैसे काल के संदर्भ में रात और दिन। संसार का प्रत्येक पदार्थ अपने आप में अपूर्णता लिए हुए है। चेतन और जड़ के सहयोग से निर्मित यह विश्व विकारयुक्त है। निर्विकारी तो एकमात्र परमात्मसत्ता ब्रह्म ही है — यह निर्विवाद सत्य है। किंतु मनुष्य का प्रतिगामी दृष्टिकोण केवल वस्तुओं, स्वयं के और संसार के कृष्णपक्ष को ही देखता है।
जिस तरह हरा चश्मा चढ़ा लेने पर चारों ओर हरा ही हरा, लाल चढ़ा लेने पर लाल ही लाल दिखाई देता है, वैसे ही संसार की विभिन्नता मनुष्य के दृष्टिकोण का ही परिणाम है। एक पेड़ को बढ़ई इस दृष्टि से देखेगा कि इसमें काम का सामान क्या-क्या बनेगा? एक दार्शनिक विश्वचेतना और जड़ के सम्मिलित सौंदर्य को देखकर खिल उठेगा। एक पशु उसे अपने भोजन की वस्तु समझेगा। एक साधारण व्यक्ति उसे कोई महत्व नहीं देगा।
हमारी मानसिक शक्ति ही बाह्य संसार के रूप में हमारे सामने आती है। दूसरों को भले रूप में देखना ही भले दृष्टिकोण — पुरोगामी मानसिक शक्ति का परिणाम है। दूसरों की बुराई, दोष-दर्शन, छिद्रान्वेषण — अपने ही विकृत आंतरिक जीवन का दर्शन है, प्रतिगामी मानसिक शक्ति का परिणाम है।
मनुष्य का जैसा दृष्टिकोण होता है, वह दूसरों के प्रति जैसा सोचता है उसी के अनुसार उसके विचार होते हैं और इनके फलस्वरूप वैसा ही वातावरण, परिस्थितियाँ प्राप्त कर लेता है। दूसरों के दोष-दर्शन, छिद्रान्वेषण करने वाले व्यक्ति जहाँ भी जाते हैं उन्हें अच्छाई नजर नहीं आती और लोगों से उनकी नहीं बनती। सबको अच्छी निगाह से देखने पर सरल, सात्विक स्वभाव के लोगों को सब जगह अच्छाई ही नजर आती है।
बुराई में भी वे ऊँचे आदर्श का दर्शन करते हैं। मरे हुए कुत्ते से लोग घृणा करते हैं किंतु करुणामूर्ति ईसा मसीह ने उसी में परमात्मा के सौंदर्य का दर्शन कर अपनी गोद में उठा लिया था।
सर्वत्र अच्छाई के दर्शन करने पर बुरे तत्त्व भी अनुकूल बन जाते हैं। इस तरह बाह्य वातावरण, परिस्थितियों के निर्माण में मनुष्य का स्वयं का अपना दृष्टिकोण और उससे प्रेरित भाव, विचार, आचरण ही प्रमुख होते हैं। मनुष्य के मित्र और शत्रु उसके भाव, विचार, दृष्टिकोण आदि ही हैं। बाह्य जगत तो मनुष्य के आंतरिक जीवन की छाया मात्र है। बाह्य परिस्थितियाँ, उलझनें, समस्याएँ एवं कठिनाइयाँ तो आंतरिक जीवन के फलस्वरूप ही हैं।
युधिष्ठिर और दुर्योधन एक ही सभा में बैठे हुए थे। दुर्योधन से पूछा गया — "आपको यहाँ कितने भले आदमी दिखाई पड़ते हैं?" उसने कहा — "मुझे यहाँ कोई भला आदमी दिखाई नहीं पड़ता।"
यही प्रश्न जब युधिष्ठिर से पूछा गया, तब उन्होंने कहा — "यहाँ मुझे सब भले ही भले दिखाई देते हैं, बुरा तो कोई नजर नहीं आता।"
मनुष्य अपने ही अच्छे-बुरे दृष्टिकोण को बाह्य परिस्थितियों पर आरोपित करके वैसा ही देखता है। जैसा मनुष्य स्वयं होगा वैसा ही बाहर देखेगा।
जो लोग अपने आप को बड़ी कठिनाइयों और शत्रुओं के बीच में घिरे हुए देखते हैं, वस्तुतः उनके विचार और भाषा की शक्ति प्रतिगामी होती है। ऐसी स्थिति में मनुष्य अपने आप को विरोधियों, हानि पहुँचाने वालों तथा काम बिगाड़ने वालों से घिरा हुआ मानकर परेशान होता है। जिसकी मानसिक शक्तियाँ पुरोगामी होती हैं, उसे चारों ओर अपने मित्र, सहायक दिखाई पड़ते हैं। वह कठिनाइयों से नहीं घबराता। दूसरों में अच्छाइयाँ ही नजर आती हैं। फलतः जीवन की भीषण, विपरीत परिस्थितियों में भी वह सफलता प्राप्त कर लेता है।
अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित कीजिए
अधिकांश व्यक्ति इस संसार में ऐसे हैं जो अपने आप को बहुत दुखी, हैरान, परेशान, अभागा और संकटग्रस्त मानते हैं। इनकी मनोव्यथा सुनी जाए और ये जी खोलकर अपनी अंतर्वेदना सुनावें तो ऐसा लगता है मानो भगवान ने संसार का सारा दु:ख इन्हीं के मत्थे पटक दिया है। बेचारे रात-दिन दुखी दशा पर खिन्न रहते हैं, रात-रात भर रोते रहते हैं, नींद नहीं आती। चिंता और वेदना में घुलते रहते हैं।
संसार में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं जिसे सब सुख हों, किसी बात का अभाव न हो, सारी परिस्थितियाँ मनोकूल ही हों, कोई कष्ट न हो, कभी असफलता न मिले, कोई जिसका विरोधी न हो — ऐसा मनुष्य इस पृथ्वी पर ढूँढे न मिलेगा। जहाँ अनेक सुख-साधन मनुष्य को भगवान ने दिए हैं, वहाँ कुछ थोड़े अभाव भी रखे हैं।
विवेकशील व्यक्ति जीवन में उपलब्ध सुख-सुविधाओं का अधिक चिंतन करते हैं और उन उपलब्धियों पर संतोष प्रकट करते हुए प्रसन्न रहते हैं और उस कृपा के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते रहते हैं।
जीवन को शांतिपूर्ण रीति से व्यतीत करने का तरीका यह है कि हम अपनी कठिनाइयों का मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर न आँकें, वरन उतना ही समझें जितनी कि वे वास्तव में हैं — तो हमारी अनेक दुश्चिंताएँ जो आसानी से नष्ट हो सकती हैं।
हमें चाहिए कि अपनी कठिनाइयों को बढ़ा-चढ़ाकर न देखें, वरन उनको दूसरे अधिक आपत्तिग्रस्त लोगों के साथ तुलना करके अपने आप को अपेक्षाकृत कम दुखी अनुभव करें।
यदि दोनों प्रकार के प्रयत्न करते हुए भी समस्या हल नहीं होती तो किसी प्रकार काम चलाऊ रास्ता निकालकर उसी में प्रसन्न और संतुष्ट रहने की कोशिश करनी चाहिए। अपने से अधिक दुखी लोगों के साथ अपनी तुलना करने से मनुष्य यह अनुभव कर सकता है कि कुछ कष्ट होते हुए भी भगवान की उस पर बड़ी कृपा है कि उसने उतना दुखी नहीं बनाया जितने अन्य लोग दुखी हैं।
दृष्टिकोण में थोड़ा अंतर कर देने से हम असंतुष्ट और खिन्न जीवन को संतोष में परिणत कर सकते हैं। ईश्वर ने सुर-दुर्लभ मानव जीवन प्रदान करके इतनी बहुमूल्य संपदा हमें प्रदान की है कि उसका मूल्य लाखों-करोड़ों रुपयों में भी नहीं कूता जा सकता।
अपना दृष्टिकोण दूरदर्शितापूर्ण रहे
दूसरे जीव-जंतुओं की अपेक्षा मनुष्य में विचार, कल्पना, विवेक और अध्ययन की जो विशेषताएँ दिखाई देती हैं, वह निस्संदेह किसी विशेष प्रयोजन के लिए हैं। इन विशेषताओं को धारण करने वाला पुरुष भी यदि अपना जीवन खाने, पहनने और काम-क्रीड़ा में बिताता है तो इसमें उसकी बुद्धिमत्ता न मानी जाएगी।
मनुष्य की श्रेष्ठता उसकी दूरदर्शिता के कारण होती है। जीवन के जिस क्षेत्र में दूरदर्शिता से काम लेते हैं, उसी में सफलता की संभावनाएँ बढ़ने लगती हैं। गृहस्थ को ही लीजिए। तत्काल सुख के आकर्षण में जो लोग अपने लिए अधिक अच्छा भोगने की लालसा रखते हैं, उनके परिवार में सौहार्द नहीं रह पाता।
दूरदर्शिता का अर्थ है — संकीर्णता का परित्याग। जब तक मनुष्य के सोचने, करने का क्षेत्र संकुचित और स्वार्थपूर्ण रहता है, तब तक वह असीम की अनुभूति से वंचित ही रहता है।
भारतीय संस्कृति के पतन का कारण यहाँ सशक्त लोगों की अदूरदर्शिता ही माना गया है। जयचंद ने व्यक्तिगत हितों के प्रवाह में इतना भी विचार नहीं किया कि बाह्य शक्ति और संस्कृति का हमारे धर्म और समाज पर कैसा असर पड़ेगा? एक व्यक्ति की संकुचित वृत्ति से संपूर्ण भारत हजार वर्षों तक परतंत्र बना रहा।
भौतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण
मानव जीवन के दो स्तर हैं — एक बाह्य, दूसरा आंतरिक; एक भौतिक, दूसरा आत्मिक। इनमें से जिनकी प्रधानता होती है, उसी के अनुसार जीवन का स्वरूप बनता है। भौतिकवादी जीवन भौतिक-स्थूल दृष्टिकोण का फल है और आध्यात्मिक जीवन मनुष्य की सूक्ष्म विवेक बुद्धि की प्रेरणा पर अवलंबित है।
भौतिकवादी दृष्टिकोण में सदैव अतृप्ति, असंतुष्टि, कुढ़न एवं खिन्नता ही बनी रहेगी क्योंकि इस संसार की सब वस्तुएँ मिलकर भी एक व्यक्ति की तृष्णा को पूरा नहीं कर सकतीं।
दूसरा व्यक्ति जो धन को ईश्वर की अमानत एवं उच्च आदर्शों के लिए सदुपयोग की सामग्री मात्र मानता है, उसे धन के संबंध में अकुलाहट क्यों होगी? उचित साधनों से जितना कमाया जा सकता है, उतने का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर लेने की कला यदि हो तो थोड़े पैसे में भी उतना आनंद एवं सत्परिणाम प्राप्त किया जा सकता है, जितना धन-कुबेरों के लिए भी संभव नहीं हो सकता।
हमें भली प्रकार यह समझ लेना चाहिए कि सुख पदार्थों में नहीं, भावनाओं में सन्निहित है। भावनाओं को जितना ऊँचा उठाया जाएगा, जितना परिष्कृत किया जाएगा, जितना आदर्शवाद का पुट दिया जाएगा — उतनी ही आध्यात्मिकता बढ़ेगी और उस अध्यात्मवादी दृष्टिकोण के आधार पर हर वस्तु सुंदर, सुरम्य एवं आनंददायक दृष्टिगोचर होने लगेगी।
अपने दोष स्वीकार कीजिए और दूसरों के भुलाइए
सद्गुण मनुष्य जीवन की प्रमुख आवश्यकता है। इससे मनुष्य के सुखों में अभिवृद्धि होती है, समाज में व्यवस्था रहती है और सर्वत्र सुखद वातावरण विनिर्मित होता है। सद्गुणी मनुष्य के लिए इस संसार में कुछ भी अभाव नहीं है। उसे आंतरिक शांति होती है। संतोष मिलता है। सहज ही आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है।
भूल को स्वीकार कर लेने में हानि कुछ भी नहीं है। अपना मन निर्मल हो जाता है और आगे के जीवन के लिए स्वस्थ-चित्त एवं जागरूक हो जाते हैं। किंतु दोष को जब दोष मानकर स्वीकार नहीं किया जाता तो मनुष्य का दुस्साहस उदीप्त होता है और उसे अपराध करने में ही आनंद आने लगता है।
अपने दोष स्वीकार कर लेने का अर्थ है — सचाई के प्रति प्रेम। सचाई मनुष्य के बाह्य-आंतरिक विकास में परमोपयोगी गुण है। अगर सचाई न हो तो मनुष्य एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकता।
गुणों का चिंतन न करें, केवल अवगुणों पर ही दृष्टिपात करें तो अपना प्रत्येक प्रियजन भी अनेक बुराइयों-दोषों में ही ग्रस्त दिखाई देगा। अत: स्नेह, आत्मीयता, सौजन्यता तथा प्रेमपूर्ण व्यवहार में कमी आएगी, जिससे जीवन के सुखों का अभाव हो जाएगा।
अपने बच्चों के छोटे-मोटे दोष भूल जाने की पिता की दृष्टि ही सच्ची होती है। माँ यदि बेटों की गलतियाँ ढूँढ़ा करे तो उसे दंड देने से ही फुरसत न मिले। अवगुणों को अपेक्षा की दृष्टि से ही देखना उचित है। पराये दोषों को भुला देना बड़प्पन का चिन्ह माना जाएगा।
मानवता का विशिष्ट लक्षण — सहानुभूति
मानव जीवन की सफलता, सौंदर्य और उपयोगिता में वृद्धि जिन नैतिक सद्गुणों से होती है, उनमें सहानुभूति का महत्त्व कम नहीं है। शक्ति, सत्यनिष्ठा, व्यवस्था, सचाई, कर्मनिष्ठा, निष्पक्षता, मितव्ययता और आत्मविश्वास के आधार पर सम्मान मिलता है, समृद्धि प्राप्त होती है और जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता के दर्शन होते हैं।
सहानुभूति मानव अंत:करण की गहन, मौन और अव्यक्त कोमलता का नाम है। इसमें स्वार्थ और संकीर्णता का कहीं भी भाव नहीं होता। जहाँ ऐसी निर्मल भावनाएँ होती हैं, वहाँ किसी प्रकार के अनिष्ट के दर्शन नहीं होते। आत्मीयता, आदर-सम्मान और एकता की भावनाएँ सहानुभूतिपूर्ण व्यक्तियों के अंत:करण में पाई जाती हैं।
दूसरों को जीतने के लिए सहानुभूति एक रामबाण है। 'सह' का अर्थ है साथ-साथ — अर्थात उस जैसी अनुभूति, उस जैसा अनुभव, बोध। जैसी उसकी अवस्था है वैसी ही अपनी — इसका नाम सहानुभूति है।
सहानुभूति लोगों में एकात्मभाव पैदा करती है। दूसरे लोगों का आंतरिक प्रेम और सद्भाव प्राप्त होता है। ऐसे लोगों में विचारहीनता और कठोरता नहीं आ सकती। वे सदैव मृदुभाषी, उदार, करुणावान और सेवा की कोमल भावनाओं से ओत-प्रोत बने रहेंगे।
रूखे, स्वार्थी, असंवेदनशील और हिसाबी व्यक्ति — चतुराई में कितने ही बढ़े-चढ़े रहें, कितने ही पढ़े-लिखे, शिक्षित तथा योग्य क्यों न हों — अंत में उन्हें सफलता से हाथ धोना ही पड़ेगा।